बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक / factors affecting to child development in hindi

दोस्तों अगर आप बीटीसी, बीएड कोर्स या फिर uptet,ctet, supertet,dssb,btet,htet या अन्य किसी राज्य की शिक्षक पात्रता परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो आप जानते हैं कि इन सभी मे बाल मनोविज्ञान विषय का स्थान प्रमुख है। इसीलिए हम आपके लिए बाल मनोविज्ञान के सभी महत्वपूर्ण टॉपिक की श्रृंखला लाये हैं। जिसमें हमारी साइट articlehindi.com का आज का टॉपिक बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक / factors affecting to child development in hindi है।

बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक / factors affecting to child development in hindi

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बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Child Development)

प्राणी के गर्भ में आने से लेकर पूर्ण प्रौढ़ता प्राप्त होने की स्थिति मानव विकास है। मानव का विकास अनेक कारकों द्वारा होता है। इनमें दो प्रमुख कारक हैं-जैविक एवं सामाजिक । जैविक विकास का दायित्व माता-पिता पर होता है और सामाजिक विकास का वातावरण पर। बालक लगभग 9 माह अर्थात् 280 दिन तक माँ के गर्भ में रहता है और तब से ही उसके विकास की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। जब भ्रूण विकसित होकर पूर्ण बालक का स्वरूप ग्रहण कर लेता है तो प्राकृतिक नियमानुसार उसे गर्भ से पृथ्वी पर आना ही पड़ता है। तब बालक के विकास की प्रक्रिया प्रत्यक्ष रूप से विकसित होने लगती है।

बालक के विकास पर वंशानुक्रम के अतिरिक्त वातावरण का भी प्रभाव पड़ने लगता है। जन्म से सम्बन्धित विकास को वंशानुक्रम तथा समाज से सम्बन्धित विकास को वातावरण कहते हैं। इसे प्रकृति (Nature) तथा पोषण (Nurture) भी कहा जाता है। वुडवर्थ का कथन है कि एक पौधे का वंशक्रम उसके बीज में निहित है और उसके पोषण का दायित्व उसके वातावरण पर है। बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं –

(1) वंशानुक्रम का प्रभाव
(2) वातावरण का प्रभाव
(3) वंशानुक्रम और वातावरण का परस्पर सहयोगी प्रभाव
(4) परिवारिक प्रभाव
(5) सामाजिक वातावरण का प्रभाव
(6) विद्यालय की आंतरिक स्थितियों का प्रभाव
(7) संचार माध्यमों का प्रभाव
(8) रेडियो,दूरदर्शन और कंप्यूटर का प्रभाव
(9) शिक्षक का प्रभाव
(10) अन्य प्रभाव

(1) वंशानुक्रम का प्रभाव (Influence of Heredity )

1. वंशानुक्रम के कारण बालकों में शारीरिक विभिन्नता होती है।

2. वंशानुक्रम के कारण बालकों की जन्मजात क्षमताओं में अन्तर होता है।

3. बालको और बालिकाओं में लिंगीय भेद वंशानुक्रम के कारण होता है, जिससे विभिन्न विषयों में उनकी योग्यता कम या अधिक होती है।

4. वंशानुक्रम के कारण बालकों में अनेक प्रकार की विभिन्नताएँ होती हैं, जो उनके विकास के साथ-साथ ही अधिक स्पष्ट होती जाती है।

5. वंशानुक्रम के कारण बालकों की सीखने की योग्यता में अन्तर होता है।

6. बालकों को वंशानुक्रम से कुछ प्रवृत्तियाँ (Tendencies) प्राप्त होती हैं, जो वांछनीय और अवांछनीय-दोनों प्रकार की होती हैं।

7. वुडवर्थ (Woodworth) के अनुसार-देहाती बालकों की अपेक्षा शहरी बालकों के मानसिक स्तर की श्रेष्ठता आंशिक रूप से वंशानुक्रम के कारण होती है।

8. वंशानुक्रम का एक नियम बताता है कि योग्य माता-पिता के बच्चे अयोग्य और अयोग्य माता-पिता के बच्चे योग्य हो सकते हैं। इस नियम को भली-भाँति समझने वाला शिक्षक ही बालकों के प्रति उचित प्रकार का व्यवहार कर सकता है।

(2) वातावरण का प्रभाव (Influence of Environment on Child)

1.बालक अपने परिवार, पड़ोस, मुहल्ले और खेल के मैदान में अपना पर्याप्त समय व्यतीत करता है और इससे प्रभावित होता है।

2. रूथ बैंडिक्ट (Ruth Bendict) के अनुसार-व्यक्ति जन्म से ही एक निश्चित सांस्कृतिक वातावरण में रहता है और उसके आदर्शों के अनुरूप ही आचरण करता है।

3. अनुकूल वातावरण में जीवन का विकास होता है और व्यक्ति उत्कर्ष की ओर बढ़ता है। इस बात को समझने वाला शिक्षक अपने छात्रों की रुचियों, प्रवृत्तियों और क्षमताओं के अनुकूल वातावरण प्रदान करके उनको उत्कर्ष की ओर बढ़ने में सहायता दे सकता है।

4. यूनेस्को (UNESCO) के कुछ विशेषज्ञों का कथन है कि वातावरण का बालकों की भावनाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ता है और उससे उनके चरित्र का निर्माण भी होता है।

5. वातावरण, बालक के विकास की दशा निश्चित करता है। वातावरण ही निश्चित करता है कि बालक बड़ा होकर अच्छा या बुरा, चरित्रवान् या चरित्रहीन, संयमी या व्यभिचारी, व्यापारी या साहित्यकार, देशप्रेमी या देशद्रोही बनेगा।

6. प्रत्येक समाज का एक विशिष्ट वातावरण होता है। बालक को इसी समाज के वातावरण से अपना अनुकूलन करना पड़ता है।

(3) वंशानुक्रम और वातावरण का परस्पर सहयोगी प्रभाव

बालक के विकास में वंशानुक्रम और वातावरण दोनों में से कौन अधिक महत्वपूर्ण है यह कहना संभव नहीं है, दोनों ही अति आवश्यक और समान उपयोगी है। किसी हालत में दोनों को एक-दूसरे का विरोधी नहीं किया जा सकता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक तथा घनिष्ठ सहयोगी हैं। बीज और भूमि दोनों में से कोई अकेला पौधे को जन्म नहीं दे सकता, बीज में उगने की शक्ति होती है और आगे जरूर एक विशेष किस्म का पौधा बन सकता है लेकिन वह ऐसा कितनी अच्छी तरह कर पाएगा, यह उस भूमि पर निर्भर करता है जिसमें उसे लगाया जा रहा है। उन्नत किस्म के अच्छे बीज और उपजाऊ मिट्टी दोनों का ठीक ढंग से संयोग होने पर ही अधिक अच्छे पौधे की आशा की जाती है। इसी प्रकार बालक के उत्तम विकास के लिए वंशानुक्रम तथा वातावरण का उत्तम संयोग आवश्यक है।

गैरेट ने इसी को स्पष्ट करते हुए लिखा है-“इससे निश्चित कोई और बात नहीं है कि वशानुक्रम और वातावरण परस्पर सहयोगी है और दोनों ही सफलता के लिए अनिवार्य है।

(4) बाल विकास पर परिवार का प्रभाव

बालक के विकास पर उसके लालन-पालन तथा माता-पिता की आर्थिक स्थितियाँ प्रभाव डालती हैं। परिवार की परिस्थितियों तथा दशाओं का बालक के विकास पर सदैव प्रभाव पड़ता है। बालक के लालन-पालन में परिवार का अत्यधिक महत्व होता है। बालक के जन्म से किशोरावस्था तक उसका विकास परिवार ही करता है। स्नेह, सहिष्णुता, सेवा, त्याग, आज्ञापालन एवं सदाचार आदि का पाठ परिवार से ही मिलता है। परिवार मानव के लिये एक अमूल्य संस्था है। बालक को व्यावहारिक जीवन की शिक्षा भी परिवार से ही मिलती है। परिवार में रहकर बालक अपने बड़ों के प्रति सम्मान का भाव तथा आज्ञापालन की भावना को ग्रहण करता है। परिवार के सभी सदस्यों से वह कर्तव्यपरायणता, आत्मसंयन तथा अनुशासन की शिक्षा प्राप्त करता है।

रूसो के अनुसार-“बालक की शिक्षा में परिवार का महत्वपूर्ण स्थान है। परिवार ही बालक को सर्वोत्तम शिक्षा दे सकता है। यह एक ऐसी संस्था है, जो मूलरूप से प्राकृतिक है।

फ्रॉबेल ने घर को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। उनके अनुसार “माताएँ आदर्श अध्यापिकाएँ हैं और घर द्वारा दी जाने वाली अनौपचारिक शिक्षा ही सबसे अधिक प्रभावशाली और स्वाभाविक है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि बालक के विकास में परिवार एक अहम संस्था की भूमिका अदा करता है।

(5) सामाजिक वातावरण एवं उसका प्रभाव

बालक को प्रभावित करने में परिवार का वातावरण अपनी भूमिका का निर्वहन करता है। समाज द्वारा बालकों पर विभिन्न प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं। विद्यालय में अनेक परिवारों से आये बालक अपने साथ अलग-अलग वातावरणीय सोच लेकर आते हैं। परन्तु विद्यालय का वातावरण एक सुनिश्चित, अनुशासित एवं शिक्षा हेतु संगठित वातावरण होता है। कहीं-कहीं तो बाहर का वातावरण विद्यालय के वातावरण से पूर्णतः विरोधी होता है। हमारा देश विविधताओं का देश है। जैसे-भाषा की विविधता, सम्प्रदाय तथा जाति की विविधता, साधनहीन तथा सम्पन्नता की विविधता हमारे बाहरी वातावरण की मुख्य समस्याएँ है।

इन सभी वातावरणीय समस्याओं से निकलकर जब बालक विद्यालय में अध्ययन करने आता है तब समस्त कठिनाइयाँ विद्यालय को झेलनी पड़ती है तथा उनका समाधान खोजना पड़ता है।

(6) विद्यालय की आन्तरिक स्थितियों का प्रभाव

बालक जब विद्यालय में प्रवेश लेता है तो विद्यालय में अधिक सुलभ साधनों की अपेक्षा रखता है। यहाँ हम उन बिन्दुओं पर चर्चा करेंगे, जिनसे बालक शिक्षा की ओर उन्मुख होता है।

(i) विद्यालय का वातावरण-शिक्षकों का व्यवहार बालको के प्रति अति सरल, सौम्य एवं स्नेहमयी होना चाहिए जिससे बालक को घर की याद न आयें । विद्यालय का भवन, साफ, स्वच्छ तथा सुविधाओं से युक्त होना चाहिए। एक शिक्षक पर बीस या पच्चीस तक बालकों की संख्या होनी चाहिए। एक अच्छे विद्यालय में पठन-पाठन की सामग्री, बालकों के खेलने के सुन्दर खिलौने, बाग-बगीचे आदि भौतिक संसाधन होने चाहिए जिससे बालक विद्यालय के प्रति आकर्षित हो सकें।

(ii) समय विभाजन चक्र-विद्यालय में बड़े छात्रों की अपेक्षा छोटे
आयु वर्ग के छात्रों के समय विभाजन चक्र में अधिक अन्तर रहता है। छोटे बच्चों की शाला प्रात: 9.30 से 12.30 तक ही संचालित करना चाहिए। इस अवधि में अल्पाहार, विश्राम, स्वास्थ्य निरीक्षण तथा प्रार्थना सभा आदि के लिये समय नियत किया जाये।

(7) संचार माध्यमों का प्रभाव

मानव समाज में अपने समुदाय एवं अन्य व्यक्तियों के प्रति निरन्तर अन्तः प्रतिक्रियाएँ करता रहता है। इस अन्तः प्रतिक्रिया का व्यापक आधार है-संचार एवं सम्प्रेषण । संचार पर ही सभी प्रकार के मानव सम्बन्ध आधारित होते है।

संचार की प्रक्रिया सामाजिक एकता एवं सामाजिक संगठन की निरन्तरता का आधार है। इसके विकास एवं विभिन्न समाजों के मध्य संचार की स्थापना पर सामाजिक प्रगति निर्भर करती है। जिस देश में जितने प्रबल एवं अत्याधुनिक संचार साधन उपलब्ध हैं, वह देश उतना ही अधिक विकसित कहा जाता है। इस प्रकार जब एक व्यक्ति या अनेक व्यक्तियों के द्वारा सूचनाओं के आदान-प्रदान का कार्य व्यापक स्तर पर होता है तब यह प्रक्रिया ‘जन-संचार कहलाती है। संचार एवं जन-संचार के अन्तर का स्पष्टीकरण टेलीफोन तथा रेडियो के उदाहरण से समझा जा सकता है। जब एक व्यक्ति टेलीफोन पर दूसरे व्यक्ति से बात करता है तो यह संचार है, लेकिन जब वही व्यक्ति रेडियो पर अपनी बात असंख्य लोगों से कहता है तो इसे जन-संचार कहते हैं।

(8) रेडियो,दूरदर्शन और कंप्यूटर का प्रभाव

(i) रेडियो का प्रभाव-रेडियो संचार माध्यमों के अन्तर्गत एक प्रभावशाली श्रव्य साधन है। रेडियो पर शैक्षिक पाठों के प्रसारण से दूर-दराज के बालकों को अत्यधिक लाभ पहुंचता है। इसके अन्तर्गत कुशल अध्यापकों के शिक्षण पाठ, भाषण एवं अन्य ज्ञान वृद्धि सम्बन्धित कहानियाँ/नाटक आदि होते हैं।

(ii) दूरदर्शन का प्रभाव-आधुनिक युग में दूरदर्शन सम्प्रेषण संचार
क्रिया का एक शक्तिशाली माध्यम है। इसमें श्रवण तथा दृश्य
सम्बन्धी इन्द्रियों का प्रयोग होता है। इसमें किसी भी घटना को फिर से रिकार्ड कर देखने तथा सुनने की व्यवस्था होती है। इसे चलाने तथा बन्द करने की क्रिया भी सरल है। शैक्षिक दूरदर्शन, छात्रों को प्रेरित करने में, उनकी सृजनात्मक क्षमता को बढ़ाने में तथा उच्च स्तरीय शिक्षण प्रदान करने सहायता प्रदान करता है।

(iii) कम्प्यूटर का प्रभाव-शिक्षा में कम्प्यूटर का उपयोग विज्ञान की
महान उपलब्धि है। इसके द्वारा जन-शिक्षा, स्वास्थ्य, राष्ट्रीय एकता
की शिक्षा आदि को सफलतापूर्वक प्रदान किया जा रहा है। कम्प्यूटर के माध्यम से सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन सम्भव हो पाया है। आज कम्प्यूटर एक विषय के रूप में कक्षाओं में पढ़ाया जाता है जिससे छात्रों को देश-विदेश से सम्बन्धित किसी भी सूचना की जानकारी कुछ क्षणों में ही प्राप्त हो जाती है।

(9) शिक्षक का प्रभाव

शिक्षक का बालक के विकास पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। यदि शिक्षक बालक के साथ मित्र बनकर उसका मार्गदर्शन करता है तो बालक जरूर ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होता है । अतः बालक के जीवन में शिक्षक का बहुत अधिक महत्व  है। बिना शिक्षक के बालक का विकास संभव ही नहीं है। शिक्षक बालक की रूचि , वैयक्तिक भिन्नता और उसकी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को ध्यान में रखकर शिक्षण कार्य करता है जो छात्र के जीवन को नई दिशा प्रदान करता है।

(10) अन्य कारण

1. पोषाहार-शैशवावस्था से लेकर किशोरावस्था तक बालक को पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन में खाद्य सामग्री विटामिनयुक्त होनी चाहिए। इससे विभिन्न रोगों से छुटकारा मिलता है क्योंकि पौष्टिक भोजन के अभाव में रोग लग जाते हैं।

2. वायु एवं सूर्य का प्रकाश-शुद्ध वायु एवं सूर्य का प्रकाश भी बालक के उत्तम विकास के लिए आवश्यक है। इसका प्रभाव बालक के कद, भार, स्वास्थ्य पर पड़ता है। दोषयुक्त वातावरण में रहने पर बालक का विकास उचित नहीं होगा। शारीरिक विकास के साथ-साथ इसका प्रभाव बालक के मस्तिष्क पर भी पड़ेगा।

3. रोग एवं चोट-विभिन्न विषैले रोगों, विषैली औषधियों एवं चोट आदि के कारण बालक का विकास रुक जाता है। यदि रोग व चोट अधिक भयंकर हो जाती है तब इनका प्रभाव मानसिक विकास पर भी पड़ता है।

                                   निवेदन

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