वैयक्तिक भिन्नता का अर्थ और परिभाषाएं / वैयक्तिक भिन्नता के प्रकार विधियां एवं कारण या आधार

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वैयक्तिक भिन्नता का अर्थ और परिभाषाएं / वैयक्तिक भिन्नता के प्रकार विधियां एवं कारण या आधार

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(Individual Differences) वैयक्तिक भिन्नता का अर्थ और परिभाषाएं / वैयक्तिक भिन्नता के प्रकार विधियां एवं कारण या आधार

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व्यक्तिगत विभिन्नता का अर्थ
Meaning of Individual Differences

व्यक्तिगत विभिन्नताओं में मनुष्य के व्यक्तिगत के वे सभी पहलू आते हैं, जिनको किसी न किसी प्रकार से मापा जा सकता है। इस प्रकार के पहलू अनेक हो सकते हैं!

जैसे- परिवर्तनशीलता, सामान्यता, विकास और सीखने की गति में अन्तर, व्यक्तित्व के विभिन्न लक्षणों में परस्पर सम्बन्ध, अनुवंशिकता और परिवेश का प्रभाव इत्यादि। इस प्रकार भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में शारीरिक और मानसिक विकास, स्वभाव, सीखने की गति और योग्यता, विशिष्ट योग्यताएँ, रुचि तथा व्यक्तित्व आदि में अन्तर देखा जा सकता है। 

वैयक्तिक भिन्नता के अन्तर्गत शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि भिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। स्किनर (Skinner) के शब्दों में, “बालक के प्रत्येक सम्भावित विकास का एक विशिष्ट काल होता है। यह विशिष्ट काल प्रत्येक व्यक्ति में वैयक्तिक भिन्नता के अनुसार पृथक्-पृथक् होता है। उचित समय पर इस सम्भावना का विकास न करने से नष्ट हो सकता है।” व्यक्तिगत विभिन्नता की अग्रलिखित परिभाषाएँ हैं-

(1) स्किनर (Skinner) के अनुसार- “मापन किया जाने वाला व्यक्तित्व का प्रत्येक पहलू वैयक्तिक भिन्नता का अंश है।” “Every aspect of the personality which can be measured in a part of individual differences.”

(2) टायलर (Tayler) के शब्दों में– “शरीर के आकार और रूप, शारीरिक कार्य,गति की क्षमताओं, बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान, रुचियों, अभिवृत्तियों और व्यक्तित्व के लक्षणों में मापी जाने वाली भिन्नताओं का अस्तित्व सिद्ध हो चुका है।” “Measurable differences have been shown to exist in physical size and shape, physiological functions, motor capacities, intelligence, achievement and knowledge, interest attitude and personality.”

(3) जेम्स ड्रेवर (James Drever) के अनुसार, “औसत समूह से मानसिक, शारीरिक विशेषताओं के सन्दर्भ में समूह के सदस्यों में भिन्नता या अन्तर को वैयक्तिक भेद या व्यक्तिगत विभिन्नता कहते है।” “Variation to deviation from average of the group union respect to the mental and physical characterstics accuring in individual member of the group.

वैयक्तिक विभिन्नताओं के प्रकार
Types of Individual Differences

व्यक्तियों या बालकों में निम्नलिखित वैयक्तिक विभिन्नताएँ पायी जाती हैं-(1) शारीरिक (Physical), (2) बौद्धिक (Intellectual), (3) सामाजिक (Social), (4) भावात्मक या सांवेगिक (Emotional), (5) नैतिक (Ethical), (6) सांस्कृतिक (Cultural) तथा (7) प्रजातीय (Racial) । इन सभी तथ्यों का उल्लेख आगे किया जा रहा है-

1. शारीरिक विभिन्नताएँ (Physical differences) –

लिंगीय भेद को हम अलग न लेकर शारीरिक भेदों के अन्तर्गत ही ले रहे हैं। इस दृष्टि से कोई स्त्री हो तो कोई पुरुष। इसी आधार पर बालक-बालिका, स्त्री-पुरुष, वृद्धवृद्धा आदि भेद होते हैं। इनमें अर्थात् बालक या बालिकाओं आदि में उनकी आयु, वजन, कद, शारीरिक गठन आदि की दृष्टि से भी भेद होते हैं। यहाँ तक कि जुड़वाँ बच्चे  (Twins) भी समान नहीं होते। पुनः शारीरिक अंगों की दृष्टि से भी किसी अंग की कमी हो सकती है और किसी में किसी अंग का विशेष उभार इस दृष्टि से भी बड़े भेद होते हैं। रंग की दृष्टि से भी कोई काला होता है और कोई गोरा। अतः शारीरिक दृष्टि से वैयक्तिक विभिन्नताओं के आधार हैं-

(1) आयु (Age)। (2) वजन (Weight)। (3) योनि (Sex) । (4) कद (Size of the body) । (5) रंग (Colour) । (6) किसी अंग-विशेष की कमी या उभार आदि।

2. बौद्धिक विभिन्नताएँ (Intellectual differences) –

बौद्धिक दृष्टि से भी सभी व्यक्ति समान नहीं होते। एक ही माता-पिता के सभी बच्चे और यहाँ तक की जुड़वाँ बच्चे भी बौद्धिक दृष्टि से समान नहीं होते। कोई मन्द बुद्धि होता है तो कोई सामान्य बुद्धि और कोई बौद्धिक दृष्टि से अति प्रखर।

3. सामाजिक विभिन्नताएँ (Social differences) –

सामाजिक दृष्टि से भी बालकों में अनेकों विभिन्नताएँ पायी जाती हैं-

(i) कुछ व्यक्ति बड़े जल्दी मित्र बना लेते हैं तो कुछ प्रयत्न करने पर भी मित्र नहीं बना पाते क्योंकि उन्हें मित्र बनाने की कला आती ही नहीं।

(ii) कुछ को अधिकतर लोग पसन्द करते हैं और कुछ को कोई नहीं, अर्थात् कुछ बड़े लोकप्रिय (Popular) होते हैं तो कुछ एकांकी (Isolated)।

(iii) कुछ सभी के साथ उठना-बैठना पसन्द करते हैं तो कुछ को अकेलापन और एकान्तप्रियता अधिक पसन्द है।

(iv) कुछ बड़ी विनोदी प्रकृति वाले और सामाजिक होते हैं तो कुछ शर्मीले और अपने ही हाल में मस्त रहने वाले।

4. नैतिक विभिन्नताएँ (Ethical differences)-

नैतिकता का मूलाधार अच्छाई और बुराई है। परन्तु अच्छाई और बुराई दोनों ही परिस्थिति सापेक्ष्य शब्द है। जो बात किसी भी व्यक्ति या बालक को अच्छी लगती है, वही बात दूसरे व्यक्ति को बुरी भी लग सकती है। नैतिकता की मोटी पहचान यही हो सकती है कि जो कार्य हम दूसरों के हित की परवाह न करके अपने स्वार्थ-सिद्धि के लिये करते हैं, सामान्यतया वही अनैतिकता है, जबकि जो कार्य परहित की दृष्टि से किये जाते हैं, वे नैतिकता में आते हैं। इस दृष्टि से भी व्यक्तियों और बालकों में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। कुछ बालक चोरी को भी बुरा नहीं समझते, झूठ बोलना उन्हें अच्छा लगता है, जबकि कुछ लोग या बालक ऐसा करना नैतिकता के विरुद्ध समझते हैं।

5. सांस्कृतिक विभिन्नताएँ (Cultural differences) –

प्रत्येक देश की एक विशेष संस्कृति होती है। जो व्यक्ति जिस देश में पला है, वहाँ की संस्कृति का उस पर प्रभाव पड़ता ही है। कुछ देशों में लोग प्रेम विवाह को सर्वोत्तम बन्धन मान सकते हैं, जबकि हमारी भारतीय संस्कृति में पले हुए लोग इसे निकृष्टतम बन्धन मानते हैं। भारतीय संस्कृति में पले हुए लोग माता-पिता और बच्चों के प्रति अपने कर्त्तव्य के लिये जितने सजग हैं, उतने अन्य संस्कृति वाले सभी लोग नहीं। यह हमारी संस्कृति का प्रभाव है। इस दृष्टि से भी व्यक्तियों की मान्यताओं एवं मूल्यों में अन्तर होता है।

6. प्रजातीय विभिन्नताएँ (Racial differences)-

प्रजाति से हमारा तात्पर्य यहाँ वर्णागत- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्रों से नहीं, अपितु उन प्रजातियों से हैं जो आदिकाल में थी और उनकी सन्तानें अभी तक चली आ रही हैं, उदाहरणार्थ- आर्यों की सन्तानें, हूण और शकों की सन्तानों आदि से भिन्न है। आज भी अफ्रीका के हब्शी अति काले होते हैं और शीत प्रधान देशों के लोग अति गोरे। प्रजातीय आधार पर काले-गोरे रंग का भेद नहीं, अपितु उनकी मान्यताओं में भी भेद है। यही नहीं, एक ही देश में भी इस प्रकार की कई प्रजातियाँ हो सकती हैं।

7. धार्मिक विभिन्नताएँ (Religious differences) –

धर्म से यहाँ हमारा आशय सम्प्रदाय से है। प्रचलित अर्थ में जिसे हम धर्म कहते हैं, वह वास्तव में धर्म न होकर सम्प्रदाय है। आप कुछ भी नाम दे, लेकिन इस दृष्टि से भी लोगों में भेद होते हैं। जैन लोग चीटी तक को मारना पाप समझते हैं, कन्द मूलों को खाना उचित नहीं समझते, जबकि कुछ सम्प्रदायों में ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

वैयक्तिक विभिन्नताओं के कारक
Factors of Individual Differences

वैयक्तिक विभिन्नताओं को मूलतः दो बातें प्रभावित करती हैं – (1) आनुवांशिकता (Heredity) तथा (2) वातावरण (Environment)।

ये कारक वैयक्तिक विभिन्नताओं को किस प्रकार प्रभावित करते हैं इसका विवेचन इस प्रकार है.

1. आनुवंशिकता एवं वैयक्तिक विभिन्नताएँ (Heredity and individual differences)–

उपरोक्त जितने प्रकार से वैयक्तिक भेद दिये गये हैं- उनमें रूप, रंग और बुद्धि (Intelligence), वंशानुक्रमण से अधिक प्रभावित होते हैं। माता-पिता का जो रूप-रंग होता है, वहीं बच्चों में भी आ जाता है। किन्तु यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न मन में उठता है कि –

यदि यह सत्य है तो एक ही माता-पिता के सभी बच्चे समान होने चाहिये, उनमें भेद की बिल्कुल सम्भावना नहीं होनी चाहिये, परन्तु ऐसा होता नहीं है। एक ही माता-पिता के सभी बच्चे यहाँ तक की जुड़वाँ बच्चे भी समान नहीं होते। फिर, यह अन्तर क्यों?

इस अन्तर को स्पष्ट करने के लिये मनोवैज्ञानिक खोजों ने यह सिद्ध कर दिया है कि बच्चे पर केवल माता-पिता का ही प्रभाव नहीं पड़ता, अपितु दादा-दादी (Grand Father and Grand Mother) एवं नाना-नानी का भी प्रभाव पड़ सकता है। यही नहीं एक ही माता-पिता के जो अलग-अलग गुण होते हैं,उनमें भी सभी बच्चे उन्हीं गुणों से और समान रूप से प्रभावित हो यह भी आवश्यक नहीं। किसी में माँ के गुण अधिक आते हैं तो किसी में पिता के। इन सभी दृष्टियों से दो बच्चे कभी भी समान नहीं हो सकते। लम्बी बीमारियों का अनुक्रमण भी वंश से ही होता है। माता या पिता को जो बीमारी होती है, वही बच्चों में भी आ सकती है। हाँ, एक बात अवश्य है कि अंगों की विकृति का विशेष प्रभाव बच्चों पर नहीं पड़ता, उदाहरण के लिये- लंगड़े माता-पिता का बच्चा भी लंगड़ा हो, ऐसा नहीं होता।

शरीर एवं बुद्धि पर आनुवंशिकता के प्रभाव को वैसे भी यदि देखा जाय तो सामान्यतया किसी भी परिवार का सबसे बड़ा बालक स्वास्थ्य की दृष्टि से हष्ट-पुष्ट मिलेगा और बौद्धिक दृष्टि से कमजोर, जबकि सबसे छोटा बालक अपने सभी भाई-बहनों में शारीरिक दृष्टि से दुर्बल और बौद्धिक दृष्टि से प्रखर होगा। यह क्यों ? यह इसलिये है कि प्रारम्भ में माता-पिता शारीरिक दृष्टि से जितने हष्ट-पुष्ट होते हैं, बौद्धिक दृष्टि से उतने परिपक्व नहीं। धीरे-धीरे वे शारीरिक दृष्टि से दुर्बल तथा बौद्धिक दृष्टि से परिपक्व होते जाते हैं और यही प्रभाव उनको सन्तानों पर पड़ता जाता है। यह कोई शाश्वत नियम नहीं है इसके अपवाद और भी हो सकते हैं।

2. वातावरण एवं वैयक्तिक विभिन्नताएँ (Environment and indivudal
differences)

शारीरिक एवं बौद्धिक विभिन्नताओं के अतिरिक्त जो सामाजिक, संवेगात्मक,नैतिक, धार्मिक प्रकार की विभिन्नताएँ होती हैं उन पर वातावरण का प्रभाव अधिक पड़ता है।

भाषा आदि सभी पर्यावरण से ही सीखी जाती है। इसी प्रकार रीति-नीतियों आदि का सम्बन्ध भी वातावरण से ही अधिक है। गुजरात में पैदा होने वाले बच्चे गुजराती सीख जाते हैं तो मेवाड़ में रहने वाले मेवाड़ी। क्यों ? क्योंकि वहाँ प्राय: वही भाषाएँ बोली जाती हैं। इसी प्रकार यदि आप नैतिक दृष्टि से लें तो भी किसी क्षेत्र तथा सम्प्रदाय विशेष में जो बात अच्छी समझी जाती है, वही बात दूसरे क्षेत्र तथा सम्प्रदाय में बुरी भी समझी जा सकती है। कहीं पर एक से अधिक शादियाँ करना अच्छा समझा जाता है कहीं पर बुरा।

इन सभी मान्यताओ पर वातावरणीय प्रभाव है। रूप-रंग, बुद्धि आदि पर वंशानुक्रमण का प्रभाव अधिक होता है परन्तु इसका यह आशय कदापि नहीं कि उन पर वातावरण का प्रभाव पड़ता ही नहीं है। वातावरण के प्रभाव से भी उनमें थोड़ा बहुत परिवर्तन सम्भव है। यदि किसी बच्चे को प्रारम्भ से ही ऐसे वातावरण में रखा जाय जहाँ वह बौद्धिक दृष्टि से किसी बात पर विचार करे तो उसकी बुद्धि में थोड़ा बहुत परिवर्तन अवश्य आता है। इसी प्रकार ठण्डी जलवायु में रंग कुछ गोरा और गर्म जलवायु में काला हो जाता है।

यहाँ यह भी स्पष्ट होना चाहिये कि वातावरण के प्रभाव से रूप, रंग, बुद्धि, शारीरिक गठन आदि में थोड़ा ही परिवर्तन सम्भव है, बहुत अधिक नहीं। काले को गोरा और गोरे को काला या बुद्ध को बुद्धिमान और बुद्धिमान को नितान्त बुद्ध केवल वातावरण के प्रभाव से नहीं बनाया जा सकता।

संक्षेप में वंशानुक्रमण और वातावरण के प्रभाव से जो वैयक्तिक भेद होते हैं, उस सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि-बालक में जन्म के समय से जो भी बातें पायी जाती हैं, उन पर वंशानुक्रमण का प्रभाव अधिक होता है, जबकि जिन्हें वह बाद में सीखता है, वे वातावरण के प्रभाव से अधिक सीखी जाती हैं। पिछड़े हुए क्षेत्रों में रहने वाली पिछड़ी जातियाँ अभी भी ईश्वर से डरती हैं, चोरी करना पाप समझती हैं, जबकि बड़े-बड़े शहरों में रहने वाले लोगों में से बहुत से इसे बिल्कुल बुरा नहीं समझते। यह सभी वातावरण का ही प्रभाव है।

वैयक्तिक भिन्नता जानने की विधियाँ (Methods of Studying Individual Differences)

व्यक्तिगत भिन्नता ज्ञात करने के लिए निम्नांकित विधियों का प्रयोग किया जाता है-
(क) परीक्षण (Tests)
(ख) व्यक्ति-इतिहास विधि (Case History Mehod)
(ग) सामूहिक अभिलेख पत्र (Cumulative Record Card)

(क) परीक्षण-

आधुनिक समय में वैयक्तिक भिन्नता का ज्ञान निम्नलिखित परीक्षाओं द्वारा प्राप्त किया जाता है-


1. बुद्धि परीक्षण (Intelligence Test)-
व्यक्तिगत भिन्नता की जानकारी बुद्धि-परीक्षणों द्वारा प्राप्त की जाती है। बुद्धि-परीक्षणों का निर्माण बिने, साइमन, टरमन, स्टर्न आदि ने किया है।

2. उपलिब्ध परीक्षण (Achievement Test)-इन परीक्षणों द्वारा पाठशाला में पढ़ाए जाने वाले विषयों में विद्यार्थी ने कितना ज्ञानार्जन किया है, इसकी जाँच की जाती है। इस परीक्षा से विद्यार्थी की भित्र-भित्र योग्यता का पता लगता है।

3. अभियोग्यता परीक्षण (Aptitude Test)- इनके द्वारा विद्यार्थी को जिन विषयों में विशिष्ट योग्यता है, इसका ज्ञान प्राप्त होता है।

4. निदानात्मक परीक्षण (Diagnostic Test) – नैदानिक परीक्षण द्वारा व्यक्ति या विद्यालय में विद्यार्थी की किसी विषय सम्बन्धी कठिनाई अथवा कमजोरी का पता लगाया जा सकता है और फिर उनकी कठिनाई और कमजोरियों का निदान (उपचार) किया जाता है।

5. अभिवृत्ति परीक्षण (Attitude Test)-अभिवृत्ति का आशय व्यक्ति के उस स्वभाव से है जिसके कारण कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु, संस्था, आदर्श या परिस्थिति में विश्वास करने लगता है या उनके प्रति अपना मत प्रकट करता है। अभिवृत्ति परीक्षणों द्वारा व्यक्ति-विशेष की अभिवृत्ति (Attitude) को जानने का प्रयास किया जात है।

(ख) व्यक्ति-इतिहास विधि-

इस विधि के द्वारा व्यक्ति के जीवन के इतिहास का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। बालक का इतिहास जानने के लिए माता-पिता, अध्यापक, मित्र आदि की सहायता ली जाती है। इस प्रकार के अध्ययन से व्यक्तिगत भिन्नता की जानकारी होती है।

(ग) सामूहिक आलेख पत्र-

इस आलेख पत्र में विद्यार्थी के सम्बन्ध में सूचनाएँ लिखी जाती हैं-उपस्थिति, सामाजिक एवं आर्थिक पृष्ठभूमि, स्वास्थ्य, रुचियाँ, सामान्य योग्यताएँ, विशिष्ट कौशल, व्यक्तित्त्व के गुण, विद्यालय के प्रति दृष्टिकोण, विद्यालय का कार्य और प्रधानाचार्य का मत। इस आलेख पत्र को देखकर बालकों की भिन्नता जानी जा सकती है।

वैयक्तिक विभिन्नताओं का महत्त्व
Importance of Individual Differences

छात्रों की विभिन्न प्रकार की भिन्नताओं के आधार पर अधिगम कार्य सम्पन्न किया जाता है। इससे प्रत्येक छात्र की शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति सरल एवं प्रभावी रूप में सम्पन्न होती है। अधिगम के स्वरूप की प्रक्रिया एवं उसे सरल रूप में सम्पन्न करने के लिये या सुलभ बनाने के लिये प्रत्येक छात्र को उसकी आवश्यकता, रुचि एवं योग्यता के अनुसार अधिगम परिस्थितियाँ उपलब्ध करायी जाती हैं। इसके स्वरूप को अग्रलिखित रूप में स्पष्ट किया जा सकता है-

(अ) मनोवैज्ञानिक भिन्नता के आधार पर अधिगम / Learning Based on Psychological Differences


मनोवैज्ञानिक भिन्नता के आधार पर व्यक्तिगत अधिगम की प्रक्रिया को निम्नलिखित रूप में स्पष्ट किया जा सकता है-

1. संवेगात्मक भिन्नता के आधार पर अधिगम (Learning based on emotional differences)

2. बौद्धिक भिन्नता के आधार पर अधिगम (Learning based on intellectual  difference)

3. रुचियों के आधार पर अधिगम (Learning based on interests )

4. सफलता के अनुभव के आधार पर अधिगम (Learning based on success experience)

5. अवधान के आधार पर अधिगम (Learning based on meditation)

6. स्मृति एवं विस्मृति के आधार पर अधिगम (Learning based on memory and forgetting)

7. शैक्षिक उपलब्धि के आधार पर अधिगम (Learning based on educational achievement)

8. विशिष्ट योग्यताओं के आधार पर अधिगम (Learning based on specific abilitics)

9. अभिवृत्ति के आधार पर अधिगम (Learning based on attitude)

(ब) शारीरिक भिन्नताओं के आधार पर अधिगम / Learning Based on Physical Differences


शारीरिक भिन्नता के आधार पर भी व्यक्तिगत अधिगम की व्यवस्था की जा सकती है। इसमें शारीरिक स्थिति को देखकर उसके अनुरूप अधिगम क्रियाओं का सृजन किया जा सकता है। इसके स्वरूप का वर्णन अग्रलिखित रूप में किया जा सकता है-

1. आयु की भिन्नता के आधार पर अधिगम (Learning based on age differences)

2. शारीरिक परिपक्वता के आधार पर अधिगम (Learning based on physical maturity)

3. स्वास्थ्य के आधार पर अधिगम (Learning based on health)

4. विकलांगता के आधार पर अधिगम (Learning based on handicapped)

5. थकान के आधार पर अधिगम (Learning based on fatigue)

6. शारीरिक गठन के आधार पर अधिगम (Learning based on physical structure)

वैयक्तिक भिन्नता पर आधारित शिक्षण प्रविधियाँ / (Teaching Techniques based on Individual Differences)

(1) डाल्टन प्रोजेक्ट
(2) डेक्राली संविदा
(3) क्रियात्मक विधि
(4) अभिक्रमित विधि
(5) किण्डरगार्टन प्रणाली
(6) ह्यूरिस्टिक पद्धति
(7) विनेटिका प्रणाली
(8) माण्टेसरी प्रणाली
(9) बेसिक शिक्षा प्रणाली
(10) कहानी पद्धति
(11) खेल द्वारा शिक्षा
(12) वार्तालाप विधि
(13) योजना पद्धति
(14) संविदा विधि

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