पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत / Piaget’s Cognitive Development Theory in hindi

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पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत / Piaget’s Cognitive Development Theory in hindi

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पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत / Piaget’s Cognitive Development Theory in hindi

Piaget’s Cognitive Development Theory in hindi / पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत

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पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त / Piaget’s Theory in hindi

जन्म- 1896 (स्विटजरलैण्ड)
गुरु- अल्फ्रेड बिने थे।
उपाधि- जन्तु विज्ञान में डॉक्टरेट की।

परिचय-जीन पियाजे Jean Piaget मूलतः जन्तु वैज्ञानिक थे, इनका जन्म 9 अगस्त, सन् 1896 ई. को स्विट्जरलैण्ड में हुआ था। अल्पायु में हो इन्होंने जन्तु विज्ञान में महारत हासिल कर लिया था। जीन पियाजे ने जन्तु विज्ञान व जीव विज्ञान के द्वारा ज्ञान प्राप्ति करने की प्रक्रिया के बीच सम्बन्ध खोजने का प्रयास किया और सीखने की प्रक्रिया जानने के लिए मनोविज्ञान का प्रशिक्षण प्राप्त किया।

मनोविज्ञान के प्रशिक्षण के दौरान जान पियाजे का सम्पर्क अल्फ्रेड बीने (Alfred Bient) से हुआ और इन्होंने फ्रेन्च स्कूल के बच्चों के बुद्धि परीक्षण पर कार्य किया और 16/9/1980 ई. को स्वर्ग सिधार गए। जीन पियाजे ने बच्चों के संज्ञानात्मक विकास पर महत्वपूर्ण व्यावहारिक सिद्धान्त प्रतिपादित किया। पियाजे ने बाल विकास का अपना अध्ययन अपनी ही तीन संतानों का प्रेक्षण करते हुए आरम्भ किया। पियाजे के अनुसार– बुद्धि एक ऐसी अनुकूली प्रक्रिया है जिसमें जैविक परिपक्वता का पारिस्थितिक प्रभाव तथा वातावराण के साथ की गयी अन्तः क्रिया दोनों ही सम्मिलित होते हैं।

पियाजे की संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ-

पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास 4 अवस्थाओं में विभाजित किया है।

1. संवेदीगामक अवस्था- जन्म (2 वर्ष) (वस्तु-स्थायित्व)
2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था- (2-7 वर्ष) पूर्व संप्रत्यात्मक अवस्था (2-4), आंतश्रज्ञ काल। (4-7)
3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था- (7-12 वर्ष)
4. औपचारिक (अमूर्त) संक्रिय अवस्था- (11-15 वर्ष)

(1)  संवेदीगामक अवस्था (जन्म से 2 वर्ष) विशेषताएँ-

1. वस्तु स्थायित्वता (6 माह)
2. Reflexaction, शारीरिक रूप से अनुभव प्राप्त (3 माह)
3. विपरीत क्रिया सीखना
ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राथमिक अनुभव
5. शारीरिक मनोवैज्ञानिक ज्ञान
6. नन्हें वैज्ञानिक शिशु को कहा- पियाजे

(2) पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था

(2 से 7 वर्ष) पूर्व संप्रत्यात्मक अवस्था (2-4वर्ष)
अन्तर्दर्शी चिन्तन (4-7 वर्ष)

1.अहंकेन्द्रिता (वास्तविकता दिखना)
2. चिह्नों के माध्यम से बात बताना
3.विपरित सोचने की क्षमता की कमी
4.कई चीजों (विमानों) को एक साथ न समझ पाना
5. निर्जीव को सजीव समझाना
6. वर्गीकरण तथा क्रमिकता न कर पाना
7.भाषा व विकास
8. खेल व अनुकरण समझना
9.रटकर सीखना
10. कार्य व कारण से अन्जान
11. समस्या समाधान से केवल एक पक्ष को देखना।

(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7 से 12 वर्ष)


1. व्यवहारिक व यथार्थवादी
2. तर्कशक्ति क्षमता का विकास शुरू
3. प्राथमिक शिक्षा की अवस्था
4. चिन्तन में क्रमबद्धता का अभाव
5. अमूर्त समस्या का समाधान न कर पाना
6. वस्तुओं को गिनना शुरू (जोड़ना, घटाना आदि)
7. वर्गीकरण (कम-ज्यादा) क्रमानुसार, व्यवस्था समझना
(कमल = क+म+ल)

(4)  औपचारिक (अमूर्त ) संक्रिय अवस्था (11 से 15 वर्ष)

1. वास्तविक वस्तुओं को काल्पनिक रूप से प्रक्षेपित करने की क्षमता
2.अनुभव का बढ़ना
3. विसंगतियों को समझना
4. चिन्तन में क्रमबद्धता
5, विचारों को संगठित रूप से समझना।
नोट- बालकों को खेल एवं स्वयं करके सीखने देना चाहिए।

संज्ञानात्मक विकास के मूल संप्रत्यय मूल संप्रत्यय


(1) संज्ञानात्मक संरचना (Cognictive Structure)
(2) स्कीमा (Schema)
(3) अनुकूलन (Adaptation)
(i) समावेशन (Assimilation)
(ii) समायोजन (Accomodation)
(4) संरक्षण (Conservation)
(5) विकेन्द्रीकरण (Decentring)

(1) संज्ञानात्मक संरचना

“किसी बालक का मानसिक संगठन वा मानसिक क्षमताएं ही उसकी संज्ञानात्मक संरचनाएं है।” – रिली, लेविस तथा टेलर
जानने की प्रक्रिया इसमें मानसिक प्रक्रियाएं जैसे- सोचना, समस्या, समाधान, तार्किक क्षमता आदि सम्मिलित है।

(2) स्कीमा

स्कीमा एक प्रकार की मानसिक संरचना है। अर्थात जब भी हम किसी चीज को देखते हैं तो हमारे में जो एक खाका बन के तैयार हो जाता है। उसी को स्कीमा बोलते हैं।

(3) अनुकूलन

अनुकूलन व्यक्ति की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा वह अपने पूर्व अनुभवों एवं नवीन अनुभवों के मध्य सन्तुलन या तालमेल स्थापित करके किसी परिस्थिति विशेष में समायोजन करने का प्रयास करता है।

अनुकूलन के दो आधार प्रक्रिया हैं –
(i) आत्मसातीकरण (Assimilation)
(ii) समायोजन (Accomodation)

जब हम किसी चीज को पहली बार देखते हैं तो हमारे दिमाग में वह सेट हो जाता है। उसे स्कीमा कहते हैं। लेकिन जो चीज हमारे दिमाग में पहले से सेट है उसे हम जब फिर से दैनिक जीवन में इस्तेमाल करते हैं तो उसे आत्मसाती करण कहते हैं।

उदाहरण– जैसे एक बालक निप्पल को मुह में डालकर चूसना सीख जाता है, तब उसे कोई भी खिलौना अगर दिया जाता है तो उसे भी वह मुंह में डालकर चूसने लगता है। इस प्रकार बालक किसी भी चीज को चूसने की क्रिया को आत्मसात कर रहा है। जैसे-हमने कोई चीज नहीं देखी है और वो अचानक हमारे सामने आ जाती है। तो हम उसको उससे मिलती जुलती चीजों से तुलना करते हैं। इसे ही समायोजन या तुल्यीकरण कहते हैं। उदाहरण– जंगल में नीलगाय को देखकर गाय से तुलना करना।

(4) संरक्षण

संरक्षण का तात्पर्य उस प्रत्यय से हैं जिसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि मूर्त वस्तुओं, आकार अथवा स्थान के परिवर्तन करने से उनकी मात्रा में कोई अन्तर नहीं आता है।

(5) विकेन्द्रीकरण

चार-पाँच महीनों तक बच्चे की सोचने की शक्ति आत्मकेन्द्रित होती है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ उसकी सोचने, समझने की शक्ति का विस्तार फैलाव होने लगता है। उसे ही विकेन्द्रिकरण कहते हैं।

पियाजे के सिद्धान्त की शिक्षण में उपयोगिता

(i) इस सिद्धान्त द्वारा विद्यार्थी के Needs, interest (रुचि) तथा Motivation (अभिप्रेरणा) को ध्यान में रखकर Teacher पाठ्यक्रम का निर्माण करता है।

(ii) Piget’s Theory से शिक्षण कार्य में शिक्षकों को सहायता मिलती है।

(iii) इस सिद्धान्त द्वारा खेल के शैक्षिक महत्व को स्पष्ट किया गया है। खेल के माध्यम से बालक में धीरे-धीरे बौद्धिक प्रतियोगिता का निर्माण होता है जो संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) का आधार है।

(iv) इस Theory के द्वारा शिक्षकों में सूझ उत्पन्न होती है।

(v) इस Theory से शिक्षकों को निर्देश मिलता है कि बच्चे की प्रत्येक कदम पर अनावश्यक मदद नहीं करनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से उसमें स्वायत्तता व आत्मविश्वास (Self Confidence) का विकास नहीं हो पाता और बौद्धिक विकास बाधित होता है।

पियाजे के सिद्धांत की कक्षा शिक्षण में उपयोगिता

(1) इस सिद्धान्त ने बालकों को स्वक्रिया द्वारा सीखने पर बल दिया।

(2) पियाजे ने अनुकरण व खेल को महत्व दिया और शिक्षक को इन
विधियों से पढ़ाना चाहिये।

(3) सीखने में प्रगति न करने वालों को दण्ड नहीं देना चाहिये।

(4) पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास के अनुसार विभिन्न श्रेणियों को विभाजित किया। उसी के अनुसार किसी भी आयु के लिए पाठ्यक्रम निर्माण करना चाहिये।

(5) पियाजे ने बुद्धि का मापन उसके व्यावहारिक उपयोग (वातावरण के साथ अन्तक्रिया) की क्षमता के रूप में लिया जाता है। बुद्धि परीक्षण निर्माण में व्यावहारिक रूप में प्रयोग से सम्बन्धित क्रियाओं का उपयोग करना चाहिये।

(6) पियाजे के सिद्धान्त के अनुसार चालक (Drives) और अभिप्रेरणा (Motivation) अधिगम एवं विकास के लिए आवश्यक है। अतः शिक्षक को शिक्षण अधिगम में इसका प्रयोग करना चाहिये।

(7) पियाजे के अनुसार सीखना बालक के स्वयं और उसके पर्यावरण से अन्तक्रिया के फलस्वरूप होता है, अतः शिक्षकों एवं अभिभावकों को बालकों के लिए उचित मार्गदर्शन करना चाहिये।

पियाजे के सिद्धांत की आलोचना

Piaget के सिद्धान्त की समीक्षा करने से पता चलता है कि यह सिद्धान्त काफी उपयोगी है परन्तु कुछ आधारों पर इसकी आलोचना भी की जाती है जैसे कुछ मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह सिद्धान्त सभी संस्कृतियों एवं सामाजिक अवस्थाओं में बच्चों में संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Devel opment) की समुचित व्याख्या नहीं कर पाता है। क्योंकि यह आवश्यक नहीं कि सभी बच्चों में एक ही आयु में सभी चीजों का समान रूप से विकास हो जाए । प्रतिभाशाली बालक कम उम्र में औपचारिक प्रचालन को प्राप्त कर लेते है परन्तु मन्द बुद्धि बालक बाद में।

इन आलोचनाओं के बाद पियाजे के संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त काफी महत्वपूर्ण माना गया है। इसके तथ्यों की उपयोगिता शिक्षकों के लिए काफी मानी गई है क्योंकि इससे बालकों के बौद्धिक विकास की व्यवस्था सन्तोषजनक हो पाती है।

                                    निवेदन

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